Satsang gyan

भगवान को पाने का सरल तरीका सत्संग है इंसान अगर अपना जीवन आराम से बिताना चाहे तो उसका जीवन बहुत आराम से बीत सकता है। लेकिन इंसान की जन्मों की दुख सहने की, दुखी और पीड़ित रहने की आदत के कारण सुख की घड़ियाों में भी वह दुख का कारण मे बना रहता है। लेकिन आपको संत्सग (satsang) ही एक ऐसा मार्ग है जो आपके चित, मन और आत्मा को शुध्द और विवेकशील, शांत व्यक्तित्व प्रदान करता है। आइऐ आज हम इस का लाभ उठाते है।

Satsang Guru Image
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सत्संग हिंदी-

सच यह है कि मानवीय देह और मन ईश्वर की खोज करने के लिए बने हैं। फिर मनुष्य होकर ईश्वर को खोजना मुश्किल कैसे हो सकता है। जैसे मनुष्य को भूख सहजता से लग जाती है। ठीक ऐसे ही जब परमात्मा की भूख तुम्हारे अंदर लगेगी, तो उससे प्यार करना भी अपने आप आ ही जाएगा। जैसे पेट की भूख स्वाभाविकता से अपने आप लग जाती है। क्या इसी तरह से परमात्मा की भूख भी अचानक दिल में उठ जाएगी। ऐसा नहीं है। यह काम सत्संग करता है। संत करते है संत का काम है अपने वचनों के माध्यम से तुम्हारे भईतर परमात्मा की भूख पैदा कर देना। तुम्हारे दिल में भूख उठे, इसलिए श्रीगुरू नानकदेव की वाणी ने संत समागम के ऊपर बहुत जोर दिया है। सत्संग करें गुरू की वाणी का परम धैर्य से सुगमता से श्रवण करें। यह एक दो दिन की बात नहीं है और न ही इतना आसान है जीवन बहुत छोटा है और इसी जीवन में बहुत कुछ करना है। गंवाने के लिए कम-से-कम एक चाबी है, सत्संग को सुनते सुनते आपके अंदर प्रेम का जन्म हो जाए, आपके भीकर भूख जन्म ले ले, तो आप भी कह सकोगे कि -मुझे कुछ अलग अनुभव हो रहा है। ऐसे ही परमात्मा से प्रेम हो जाने के बाद भले ही उसे अपने ही कर्मों का फल सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ यश-अपयश के रूप में भोगना पड़ता है, फिर भी भक्त कहता है, यह तो मेरे प्यारे ने भेजा है, किस कर्म का कौन-सा भोग कब मिलेगा, यह कोई नहीं जानता है, पर यह भोग भेजा को उसी ने है। इस भाव के साथ भक्त बहुत खुशी से उसे स्वीकार करता है। चिल्लाते वे ही हैं, शिकायक वे ही करते हैं, जिनको प्यार नहीं है। जिनको प्यार है, उनके जीवन से शिकायक बिलकुल ही चली जाती है।

संत की संगत-

किसी संत या गुरू के प्रवचन बैठना, पवित्र ग्रंथों जैसे गीता, शिव कथा , रामचरितमानस, उपनिषद आदि का पाठ करना, या भजन-कीर्तन में भाग लेना भी सत्संग का ही रूप है। आज के समय में जब मनुष्य तनाव, चिंता और लालच में उलझा है, तब सत्संग ही उसे मानसिक शांति और नैतिक शक्ति प्रदान कर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- सत्संग से विवेक उत्पन्न होता है, विवेक से भक्ति, और भक्ति से मुक्ति। अर्थात् जो व्यक्ति सत्संग करता है, वह धीरे-धीरे अपने जीवन में सही और गलत का भेद समझने लगता है। उसका मन निर्मल होता है और अंततः वह मुक्ति की और अग्रसर होता है।

सत्संग के लाभ-

सत्संग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह मनिष्य के विचारों को बदल देता है। जब विचार बदलते हैं, तो कर्म भी बदलते हैं। और जब कर्म बदलते हैं, तो भाग्य भी बदल जाता है। संगति का असर बड़ा भारी, जैसी संगत वैसी रंगत यदि हम बुरे लोगों की संगत करेंगें तो बिराई की ओर बड़ेंगे, और यदि संतों की संगत करेंके तो ईश्वर की ओर यही सत्संग का चमत्कार है।

सत्संग से ईश्वर की प्राप्ति-

सत्संग केवल धर्म या पूजा तक सीमित नहीं है, यह जीवन जीने की कला सिखाता है। यह हमें सिखाता है कि कैसे -क्रोध, अहंकर, लोभ, से मुक्त होकर करुणा और सादगी से जीवन जिया जाए। ईश्वर की प्राप्ति जिस मार्ग से हो वह आपको इतनी आसानी से तो आपका मन नहीं लगेगा मगर एक बार आपने अपने आप को इसमें रमा दिया तो किसी की हिम्मत नहीं है कि आपको इस भक्ति के मार्ग जाने से रोक दें। आज की भागदौड़ भरी दुनिया में जब हर व्यक्ति बेचैन है, तब सत्संग ही वह स्थान है जहाँ आत्मा को विश्राम मिलता है। वहां पहुँचकर व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और ईश्वर से जुड़ने की अनुभूति करता है। हम प्रतिदिन थोड़ा समय सत्संग के लिए निकालें किसी संत के प्रवचन सुनें, कोई भक्ति ग्रन्थ पढ़ें, या ईश्वर का नाम जपें । यही हमारे जीवन को पवित्र और आनंदित शांतिपूर्ण बनाता है।

निष्कर्ष-

संत्संग आत्मा का आहार है, जैसे भोजन शरीर का आहार है। जो व्यक्ति सत्संग करता है, उसके जीवन में ज्ञान , शांति और आनंद भर जाता है। वह दूसरों के प्रति करूणामय, और अपने भीतर संतुलित रहता है।

सत्संग ही जीवन का सार है, जो इसे समझ लेता है, वह स्वंय को जान लेता है।

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