
एकादशी के व्रत के बारे में यह जानकारी एकत्रित की है, कि एकादशी व्रत कब और किस तरीके से मनाना चाहिए। एकादशी व्रत की बड़ी महिमा है, एक ही दशा में रहते हुए, अपने आराध्य देव का पूजन व वंदन करने की प्रेरणा देने वाला व्रत ही एकादशी व्रत कहलाता है। पदम पुराण के अनुसार महादेव ने नारद जी को उपदेश देते हुए कहा था। एकादशी महान पुण्य देने वाली होती है। कहा जाता है कि जो मनुष्य एकादशी का व्रत रखता है। उसके पित्र और पू्रवज को योनि को त्याग स्वर्व लोग चले जाते है। आईऐ एकादशी से जुड़ी बातो को गहराई से देखते है।
एकादशी क्या है ?
हिन्दू पंचाग की ग्यारहवी तिथि को एकादशी कहते है। एकादशी संस्कृत भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ होता है ग्यारह । प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है, एक शुक्ल पक्ष के बाद दूसरी कृष्ण पक्ष के बाद, पूर्णमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते है। प्रत्येक पक्ष की एकादशी का अपना महत्व है, हिन्दू धर्म में इसकी बहुत मान्यता है।
एकादशी का महत्व-
पुराणों के अनुसार एकादशी को हरिदिन और हरिवाषर के नाम से भी जाना जाता है, इस व्रत को वेष्णव और गैर वैष्णव दोनों ही समुदायों द्वारा ही मनाया जाता है, ऐसा कहा जाता है, कि एकादशी व्रत हवन और यज्ञ वैदिक कर्मकाण्ड से भी अधिक फल देता है, इस व्रत को रखने की एक मान्यता यह भी है, कि इससे पूर्वजो को स्वर्ग की प्राप्ति होती है, स्कंद पुराण में भी इस महत्व के बारे में बताया गया है। जो भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है इसके लिए एकादशी के दिन गेहूं मसालेे और सब्जियाँ आदि का सेवन वर्जित होता है, भक्त एकादशी व्रत की तैयारी एक दिन पहले यानि दशवी से ही शुरू कर देते है दशमी के दिन व्यक्ति पातःकाल जल्दी उठकर जल्दी स्नान करते है और विना नमक को भोजन ग्रहण करते है।
एकादशी व्रत का नियम-
एकादशी व्रक करने का नियम बहुत ही शक्त होता है, जिसमें व्रत करने वाले को एकादशी तिथ के पहले सूर्यास्त से लेकर एकादशी के सूर्योदय तक उपवास रखना पड़ता है। इस व्रत को कोई भी व्यक्ति अपनी स्वेच्छा से रख सकता है, इस व्रत की चाह रखने वाले लोगों को दशमी से ही कुछ जरूरी नियमों को मानना पड़ता है, अर्थात् दशमी से ही भक्तो को माँस मछली दारू, दाल मशूर की दाल और शहद जैसे खाद्य पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिऐ। और दशमी तिथि से ही ब्रम्हाचार्य व्रत का पालन करना चाहिए, व्रत वाले दिन सुबह दाँत साफ करने के लिए लकड़ी का दातून इस्तेमाल न करें, इस दिन वृक्ष से पत्ते तोड़ना वर्जित होता है, स्नान जाने के बाद आप मन्दिर में जाकर गीता का पाठ करें या सुनें, सच्चे मन से-
‘ ओम नमो भगवते वासुदेवाय ‘ का जप करें, विष्णु भगवान का स्मरण करें। एकादशी के अगले दिन को द्वादशी के नाम से जाना जाता है,। द्वादशी के दिन सुबह जल्दी नहाकर भगवान विष्णु की पूजा करते है इस दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान और दक्षिणा आदि प्रदान करते है,
एकादशी व्रत का भोजन-
शास्त्रों के अनुसार आप निम्नलिखित चीजों का सेवन कर सकते है,
.ताजे फल
.मेवे चीनी
.किट्टू
.नारियल
.जेतून दूख
.अदरक
.कालीमिर्च
.सेंधा नमक
.आलू
.सावूदाना
.शकलकन्द
एकादशी व्रत का भोजन सात्विक होना चाहिऐ, कुछ व्यक्ति इस व्रत को विना पानी पिऐ सम्पन्न करते है, इसे निर्झला एकादशी नाम से जाना जाता है।
एकादशी को क्या न करें-
.वृक्ष से पत्ते ना तोड़ें
.घर में झाडूं न लगाऐं, ऐसा इसलिए किया जाता ह (क्योंकि घर में झांडू लगाने से चीटिंयो व छोटे छोटे जीवों के मरने का डर होता है, और जीव हत्या पाप है।)
.बाल नहीं कट वाऐँ
(जरूरत हो तभी बोले, क्योंकि ज्यादा बोलने से गलत शब्द निकलने से शंम्भावना ज्यादा रहती हैं।)
एकादशी के दिन चावल, और बैंगन खाना वर्जित होता है। इसी दिन किसी के द्वारा दिया हुआ अन्न नहीं खाना चाहिऐ।
मन में किसी प्रकार का विकार न आवें।
एकादशी व्रत की कथा-
हर व्रत को मनाये जाने के पीछे कोई न कोई धार्मिक वजह या कथा छुपी हिती है। एकादशी व्रत मनाने के पीछे भी कई कहानियां है। एकादशी व्रत कथा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसा कि हम सब जानते हैं एकादशी प्रत्येक महीने में दो बार आती है, जिन्हें हम अलग नामें से जानते हैं। सभी एकादशियों के पीछे अपनी अलग कहानी छुपी है। एकादशी व्रत के दिन उससे जुड़ी व्रत कथा सुनना अनिवार्य होता है।
